Marriage For Astrology

22 Feb 2016 slider-1

केसा मिलेगा पति–जानिए की कन्या/युवती की कुंडली

जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।

—-जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में गुरु उपस्थित हो तो उसे सुंदर, धनवान, बुद्धिमान पति व श्रेष्ठ संतान मिलती है।भाग्य भाव में या

सप्तम, अष्टम और नवम भाव में शुभ ग्रह होने से ससुराल धनाढच्य एवं वैभवपूर्ण होती है।

—-कन्या की जन्मकुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र आदि में से कोई उपस्थित हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद

प्राप्त करता है तथा उसे सुख व वैभव प्राप्त होता है।

—-जब कांय की कुंडली के लग्न में चंद्र हो तो ऐसी कन्या पति को प्रिय होती है और चंद्र व शुक्र की युति हो तो कन्या ससुराल में अपार संपत्ति

एवं समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करती है।

—–जिस कन्या की कुंडली में वृषभ, कन्या, तुला लग्न हो तो वह प्रशंसा पाकर पति एवं धनवान ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।कन्या की

कुंडली में जितने अधिक शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र लग्न को देखते हैं या सप्तम भाव को देखते हैं, उसे उतना धनवान एवं प्रतिष्ठित

परिवार एवं पति प्राप्त होता है।

—–जिस कन्या की जन्मकुंडली में लग्न एवं ग्रहों की स्थिति की गणनानुसार त्रिशांश कुंडली का निर्माण करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि

यदि कन्या का जन्म मिथुन या कन्या लग्न में हुआ है तथा लग्नेश गुरु या शुक्र के त्रिशांश में है तो उसके पति के पास अटूट संपत्ति होती है

तथा कन्या सदैव ही सुंदर वस्त्र एवं आभूषण धारण करने वाली होती है।

—–जब कुंडली के सप्तम भाव में शुक्र उपस्थित होकर अपने नवांश अर्थात वृषभ या तुला के नवांश में हो तो पति धनाढच्य होता है।सप्तम

भाव में बुध होने से पति विद्वान, गुणवान, धनवान होता है, गुरु होने से दीर्घायु, राजा के संपत्ति वाला एवं गुणी तथा शुक्र या चंद्र हो तो

ससुराल धनवान एवं वैभवशाली होता है।

—-जब एकादश भाव में वृष, तुला राशि हो या इस भाव में चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो ससुराल धनाढच्य और पति सौम्य व विद्वान होता है।हर

पुरुष सुंदर पत्नी और स्त्री धनवान पति की कामना करती है।

——यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसकी पत्नी शिक्षित, सुशील, सुंदर एवं कार्यो में दक्ष होती है, किंतु ऐसी स्थिति

में सप्तम भाव पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो दाम्पत्य जीवन में कलह और सुखों का अभाव होता है।

——जब जातक की जन्मकुंडली में स्वग्रही, उच्च या मित्र क्षेत्री चंद्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है तथा उसे सुंदर, सुशील,

भावुक, गौरवर्ण एवं सघन केश राशि वाली रमणी पत्नी प्राप्त होती है। सप्तम भाव में क्षीण चंद्र दाम्पत्य जीवन में न्यूनता उत्पन्न करता है।

—-जब जातक की कुंडली में सप्तमेश केंद्र में उपस्थित हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होती है, तभी जातक को गुणवान, सुंदर एवं सुशील

पत्नी प्राप्त होती है।पुरुष जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित हो तो ऐसा जातक सौभाग्यशाली

होता है तथा उसकी पत्नी सुंदर, सुशिक्षित होती है और कला, नाटच्य, संगीत, लेखन, संपादन में प्रसिद्धि प्राप्त करती है। ऐसी पत्नी

सलाहकार, दयालु, धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में रुचि रखती है।

विवाह के पूर्व किन चीजो का ध्यान रखें:- एक ज्योतिषीय परामर्श

रूप, सौंदर्य, स्वास्थय, स्तर तथा गणना आदि सब तरह से जब आश्वस्त हो जाएँ तो कृपया निम्न बातो को आवश्यक रूप से जांच लें-

लडके एवं लड़की दोनों का जन्म एक दूसरे के तृतीयांत राशि में न हो। अर्थात यदि लडके का जन्म मेष राशि के अंत में अर्थात कृत्तिका नक्षत्र

के प्रथम चरण में हो तो लड़की का जन्म मिथुन राशि के अंत अर्थात पुनर्वसु नक्षत्र के अंतिम चरण में नहीं होना चाहिये।

कुंडली में लडके के जिस भाव में सूर्य हो लड़की की कुंडली में उस भाव में गुरु न होवे।

लड़की के जिस भाव में मंगल हो लडके की कुंडली में उस भाव में शुक्र न होवे।

लडके की कुंडली में यदि आठवें भाव में शनि, राहु, मंगल या सूर्य हो तो लड़की की कुंडली में इसी भाव में इनमें से कोई भी ग्रह उस शर्त पर हो

जो लडके के अष्टक वर्ग में आठवें भाव में 4 या इससे कम अंक लिया हो। अन्यथा अल्पायु योग स्वतः बन जायेगा।

विवाह का मुहूर्त तभी निकालें जब लड़का या लड़की किसी एक का किसी भी ग्रह में राहु की अन्तर्दशा चल रही हो। तथा दूसरे की सप्तम या

दूसरे भाव की संध्या दशा में पाचक दशा चल रही हो। ऐसा इसलिये ताकि आजीवन एक की दशा विपरीत होने पर दूसरे की दशा बली होकर

उसे सहारा दे देती है।

पारंपरिक गणना के अनुसार यदि नाडी एक हो जाती है। तो शादी निषिद्ध कर दी जाती है। कारण यह है की एक तो गणना में सीधे आठ अंक

कम हो जाते है। दूसरे वंश क्रम अवरुद्ध होने का कथन है। किन्तु यदि दोनों की कुंडली में पंचमेश, सप्तमेश एवं लग्नेश दोनों के पांचवें भाव की

राशि में 5 या इससे अधिक अंक पाते है। तो वंशक्रम अवरुद्ध नहीं हो पाता है।

केवल मांगलिक योग शादी में 20% ही बाधक बन सकता है। वह भी तब जब अष्टमेश एवं द्वादशेश दोनों के अष्टम एवं द्वादश भाव में 5 या

इससे अधिक अंक पाते है। यदि लग्नेश, सप्तमेश एवं पंचमेश सप्तम भाव में 5 या इससे अधिक पाते है, तथा इनमें से कोई अस्त या नीच का

न हो तो लड़का-लड़की दोनों आजीवन सुखी एवं खुश रहेगें। चाहे कुंडली कितनी भी भयंकर मांगलीक क्यों न हो।

दोनों के सप्तमांश कुंडली में सप्तमेश परस्पर शत्रु ग्रह नहीं होने चाहिये। यदि संयोग से ऐसा हो भी जाता है, तो शादी के समय उस नक्षत्र में

विवाह कदापि न करें जिसमे जन्म के समय दोनों के सप्तमेश हो।

यदि सप्तम भाव में प्रत्येक ग्रह को 5 या इससे अधिक मिलें तो गणना न मिलने पर भी शादी सदा शुभ होगी।

इसके विपरीत यदि गणना के अंक 25 या 30 या इससे अधिक ही क्यों न मिलें, किन्तु अष्टक वर्ग में यदि प्रत्येक ग्रह को 3 या इससे कम

अंक मिलते हो, तो वह विवाह सदा ही अशुभ होता है।

यदि भाव दोष के कारण विवाह में बाधा पहुँच रही हो तो पहले नक्षत्र व्युत्क्रमण की विधि पूरी करें। यदि नक्षत्र दोष के कारण बाधा हो तो

स्थान व्युत्क्रमण की विधि पूरी करें। किन्तु यदि दोनों दोष हो तो विवाह किसी भी कीमत पर न करें।

और अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि ये सारे प्रतिबन्ध या सम्मति सिर्फ उनके लिए लागू है जो ज्योतिष, गणना या इस परम्परा को मानते हैं।

जो नहीं मानते या विशवास करते उनके लिये यह सारा विवरण निरर्थक है।

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